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अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
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भीष्म उवाच
दुर्वासा वै तेन नान्येन शक्यो; गृहे राजन्वासय़ितुं महौजाः |  २७   क
तमेवाहुरृषिमेकं पुराणं; स विश्वकृद्विदधात्यात्मभावान् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति