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द्रोण पर्व
अध्याय ६१
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धृतराष्ट्र उवाच
वभूवुर्ये मनोग्राह्याः शव्दाः श्रुतिसुखावहाः |  ६   क
न श्रूय़न्तेऽद्य ते सर्वे सैन्धवस्य निवेशने ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति