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उद्योग पर्व
अध्याय १३१
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कुन्त्यु उवाच
शत्रुर्निमज्जता ग्राह्यो जङ्घाय़ां प्रपतिष्यता |  १८   क
विपरिच्छिन्नमूलोऽपि न विषीदेत्कथञ्चन |  १८   ख
उद्यम्य धुरमुत्कर्षेदाजानेय़कृतं स्मरन् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति