शल्य पर्व  अध्याय ६१

सञ्जय़ उवाच

किमेतन्महदाश्चर्यमभवद्यदुनन्दन |  १७   क
तन्मे व्रूहि महावाहो श्रोतव्यं यदि मन्यसे ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति