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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा द्रोणाय़ पाञ्चाल्यं व्रजन्तं युद्धदुर्मदम् |  १८   क
यमाभ्यां तांश्च संसक्तांस्तदन्तरमुपाद्रवत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति