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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
प्रशमाद्धि भवेच्छान्तिर्मदन्तं युद्धमस्तु च |  ५१   क
भ्रातृभावेन पृथिवीं भुङ्क्ष्व पाण्डुसुतैः सह ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति