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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
उपप्लव्ये महर्षिर्मे कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् |  ३०   क
यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जय़ः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति