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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुक्ते ते वीराः शिविरं तव भारत |  ३१   क
प्रविश्य प्रत्यपद्यन्त कोशरत्नर्द्धिसञ्चय़ान् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति