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उद्योग पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टवानस्मि राजेन्द्र कुन्तीपुत्रान्महारथान् |  १४   क
मत्स्यराजगृहावासादवरोधेन कर्शितान् |  १४   ख
शृणु यैर्हि महाराज पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति