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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
ते प्राप्य धनमक्षय़्यं त्वदीय़ं भरतर्षभ |  ३३   क
उदक्रोशन्महेष्वासा नरेन्द्र विजितारय़ः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति