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आदि पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
संमतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान् |  १४   क
भूय़ो धर्मपरैर्भावैर्विदितं जनमावसत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति