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शान्ति पर्व
अध्याय ६२
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भीष्म उवाच
या सञ्ज्ञा विहिता लोके दासे शुनि वृके पशौ |  ५   क
विकर्मणि स्थिते विप्रे तां सञ्ज्ञां कुरु पाण्डव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति