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शान्ति पर्व
अध्याय ६२
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भीष्म उवाच
व्राह्मणस्य विशुद्धस्य तपस्यभिरतस्य च |  ७   क
निराशिषो वदान्यस्य लोका ह्यक्षरसञ्ज्ञिताः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति