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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
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भीष्म उवाच
निवर्तस्व विवित्साभ्यः शाम्य निर्विद्य मामक |  १८   क
असकृच्चासि निकृतो न च निर्विद्यसे तनो ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति