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अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
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नारद उवाच
व्राह्मणो हि महद्भूतं क्षेत्रं चरति पादवत् |  २८   क
उप्यते तत्र यद्वीजं तद्धि पुण्यफलं महत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति