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सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
माद्रीसुतस्तत्परिगृह्य वाक्यं; धर्मेण धर्मप्रतिमस्य राज्ञः |  २७   क
यय़ौ रथेनालय़माशु देव्याः; पाञ्चालराजस्य च यत्र दाराः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति