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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं प्रणिपातेन गिरीशस्य महात्मनः |  १३   क
तदानय़ाम भद्रं ते समभ्यर्च्य कपर्दिनम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति