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शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
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नारद उवाच
अहिते हितसञ्ज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसञ्ज्ञकः |  २७   क
अनर्थे चार्थसञ्ज्ञस्त्वं किमर्थं नाववुध्यसे ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति