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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां प्रय़ास्यतां तत्र मङ्गलानि शुभान्यथ |  २०   क
प्राहुः प्रहृष्टमनसो द्विजाग्र्या नागराश्च ते ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति