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सभा पर्व
अध्याय ६२
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द्रौपद्यु उवाच
जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं वा यथा नृपाः |  १३   क
तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत्करिष्यामि कौरवाः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति