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सभा पर्व
अध्याय ६२
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भीष्म उवाच
वलवांस्तु यथा धर्मं लोके पश्यति पूरुषः |  १५   क
स धर्मो धर्मवेलाय़ां भवत्यभिहितः परैः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति