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सभा पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
अनीश्वरं विव्रुवन्त्वार्यमध्ये; युधिष्ठिरं तव पाञ्चालि हेतोः |  २५   क
कुर्वन्तु सर्वे चानृतं धर्मराजं; पाञ्चालि त्वं मोक्ष्यसे दासभावात् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति