सभा पर्व  अध्याय ६२

वैशम्पाय़न उवाच

न हि मुच्येत जीवन्मे पदा भूमिमुपस्पृशन् |  ३४   क
मर्त्यधर्मा परामृश्य पाञ्चाल्या मूर्धजानिमान् ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति