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वन पर्व
अध्याय ६२
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वृहदश्व उवाच
अशोचत्तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम् |  १२   क
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽय़ं जनार्णवः |  १२   ख
हतोऽय़ं हस्तिय़ूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तु ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति