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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
आर्जुनिर्नृपतिं विद्ध्वा शरैः संनतपर्वभिः |  १८   क
पुनरेव चतुःषष्ट्या राजन्विव्याध तं नृपम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति