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वन पर्व
अध्याय ६२
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वृहदश्व उवाच
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा |  २०   क
अनुजग्मुस्ततो वाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति