वन पर्व  अध्याय ६२

वृहदश्व उवाच

ततो वहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् |  ३२   क
वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान्मामनागसम् ||  ३२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति