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वन पर्व
अध्याय ६२
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वृहदश्व उवाच
वसस्व मय़ि कल्याणि प्रीतिर्मे त्वय़ि वर्तते |  ३५   क
मृगय़िष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति