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वन पर्व
अध्याय ६२
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वृहदश्व उवाच
तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमव्रवीत् |  ४१   क
सर्वमेतत्करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति