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द्रोण पर्व
अध्याय १२७
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कर्ण उवाच
न तेषां मतिपूर्वं हि सुकृतं दृश्यते क्वचित् |  २१   क
दुष्कृतं तव वा वीर वुद्ध्या हीनं कुरूद्वह ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति