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शान्ति पर्व
अध्याय २१३
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भीष्म उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |  १८   क
विक्रम्य घोरे तपसि व्राह्मणः संशितव्रतः |  १८   ख
कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान्निरपाय़ इवात्मवान् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति