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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
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वासुदेव उवाच
हविर्भूता गुणाः सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं मुखम् |  २४   क
अन्तर्वासमुषित्वा च जाय़न्ते स्वासु योनिषु |  २४   ख
तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलय़े भूतभावने ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति