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द्रोण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
तेषां तत्तादृशं कर्म त्वामासाद्य सुनिष्फलम् |  १६   क
यत्पित्र्याद्भ्रंशिता राज्यात्त्वय़ेहामिषगृद्धिना ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति