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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
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वैशम्पाय़न उवाच
इति पृष्टो द्विजैस्तैः स प्रहस्य नकुलोऽव्रवीत् |  १८   क
नैषानृता मय़ा वाणी प्रोक्ता दर्पेण वा द्विजाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति