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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
ततः क्रुद्धो वृषसेनोऽभ्यधाव; दातस्थिवांसं स्वरथं हतारिम् |  १७   क
वृकोदरं कालमिवात्तदण्डं; गदाहस्तं पोथमानं त्वदीय़ान् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति