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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावन्नकुलः प्रवीरो; रोषादमित्रं प्रतुदन्पृषत्कैः |  १८   क
कर्णस्य पुत्रं समरे प्रहृष्टं; जिष्णुर्जिघांसुर्मघवेव जम्भम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति