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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
ततो हताश्वादवरुह्य याना; दादाय़ चर्म रुचिरं चाष्टचन्द्रम् |  २३   क
आकाशसङ्काशमसिं गृहीत्वा; पोप्लूय़मानः खगवच्चचार ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति