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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
द्विसाहस्रा विदिता युद्धशौण्डा; नानादेश्याः सुभृताः सत्यसन्धाः |  २५   क
एकेन शीघ्रं नकुलेन कृत्ताः; सारेप्सुनेवोत्तमचन्दनास्ते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति