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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
तं कर्णपुत्रो विधमन्तमेकं; नराश्वमातङ्गरथप्रवेकान् |  २७   क
क्रीडन्तमष्टादशभिः पृषत्कै; र्विव्याध वीरं स चुकोप विद्धः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति