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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
तस्याय़सं निशितं तीक्ष्णधार; मसिं विकोशं गुरुभारसाहम् |  २९   क
द्विषच्छरीरापहरं सुघोर; माधुन्वतः सर्पमिवोग्ररूपम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति