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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निरापस्तथाकाशं पृथिवी वाय़ुरेव च |  २४   क
विमुञ्चन्तु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति