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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
अथ तव रथमुख्यास्तान्प्रतीय़ुस्त्वरन्तो; हृदिकसुतकृपौ च द्रौणिदुर्योधनौ च |  ३४   क
शकुनिशुकवृकाश्च क्राथदेवावृधौ च; द्विरदजलदघोषैः स्यन्दनैः कार्मुकैश्च ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति