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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
कुणिन्दपुत्रावरजस्तु तोमरै; र्दिवाकरांशुप्रतिमैरय़स्मय़ैः |  ३८   क
रथं च विक्षोभ्य ननाद नर्दत; स्ततोऽस्य गान्धारपतिः शिरोऽहरत् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति