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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
स नागराजः सह राजसूनुना; पपात रक्तं वहु सर्वतः क्षरन् |  ४५   क
शचीशवज्रप्रहतोऽम्वुदागमे; यथा जलं गैरिकपर्वतस्तथा ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति