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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
रथी द्विपस्थेन हतोऽपतच्छरैः; क्राथाधिपः पर्वतजेन दुर्जय़ः |  ४७   क
सवाजिसूतेष्वसनस्तथापत; द्यथा महावातहतो महाद्रुमः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति