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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
स नागराजः सनिय़न्तृकोऽपत; त्पराहतो वभ्रुसुतेषुभिर्भृशम् |  ४९   क
स चापि देवावृधसूनुरर्दितः; पपात नुन्नः सहदेवसूनुना ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति