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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽभ्यविध्यद्वहुभिः शितैः शरैः; कुणिन्दपुत्रो नकुलात्मजं स्मय़न् |  ५२   क
ततोऽस्य काय़ान्निचकर्त नाकुलिः; शिरः क्षुरेणाम्वुजसंनिभाननम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति