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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
तदस्य कर्मातिमनुष्यकर्मणः; समीक्ष्य हृष्टाः कुरवोऽभ्यपूजय़न् |  ५४   क
पराक्रमज्ञास्तु धनञ्जय़स्य ते; हुतोऽय़मग्नाविति तं तु मेनिरे ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति