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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
पुनः स पार्थं वृषसेन उग्रै; र्वाणैरविध्यद्भुजमूलमध्ये |  ५८   क
तथैव कृष्णं नवभिः समार्दय़; त्पुनश्च पार्थं दशभिः शिताग्रैः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति