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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिः पृषत्कै; र्मर्मस्वसक्तं प्रसभं किरीटी |  ६०   क
चिच्छेद चास्येष्वसनं भुजौ च; क्षुरैश्चतुर्भिः शिर एव चोग्रैः ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति